क्षेत्रवाद वह निरंतर भूभाग है जिस के सदस्यों के बीच कुछ ना कुछ पारंपरिक साझा आधार उपस्थित होता है। यह पारंपरिक साझा का आधार संस्कृति हो सकती है, भाषा हो सकती है एवं इतिहास भी हो सकता है क्योंकि ऐसे भौगोलिक क्षेत्रों के निवासियों के बीच एक साझा आधार उपस्थित होता है उन्हें अपना होने का भाव उत्पन्न होता है। लोग अपनी पहचान को क्षेत्र विशेष से जोड़ कर देखने लगते हैं एवं वह क्षेत्र ही उनकी पहचान बन जाता है।
क्षेत्रवाद के तीन प्रमुख आधार हो सकते हैं -पहला आधार यह है कि एक क्षेत्र में निवास करने वाले लोग यह मान लेते हैं कि उनके क्षेत्रीय हित समान हैं।
दूसरा आधार यह है कि एक क्षेत्र विशेष के लोग यह मान लेते हैं कि किसी दूसरे क्षेत्र के लोगों के क्षेत्रीय हित उनके हितों से भिन्न है।
तीसरा आधार यह है कि एक क्षेत्र के निवासी यह मान लेते हैं कि किसी भी अन्य क्षेत्र के क्षेत्रीय हित ना सिर्फ उनके हितों से भिन्न है बल्कि उनके हितों के विरुद्ध भी हैं।
जब मात्र पहले दो आधार उपस्थित होते हैं तब उसे उदार क्षेत्रवाद कहते हैं। यह उदार क्षेत्रवाद राष्ट्रीय अखंडता के लिए किसी भी प्रकार से खतरा नहीं है।क्षेत्रवाद की यह भावना एक क्षेत्र विशेष से संबंधित लोगों की निष्ठा को क्षेत्र के प्रति बढ़ाती है एवं किसी अन्य क्षेत्र के साथ किसी भी प्रकार के संघर्ष को जन्म नहीं देती है। इससे ऊपर राष्ट्रवादी मान्यताएं उत्पन्न होती हैं जिसके अंतर्गत क्षेत्र को देश की तुलना में वरीयता दी जाती है।
भारत कई सारे विभिन्न क्षेत्रों का एक समीकरण रहा है इन सभी क्षेत्रों को अपना भिन्न-भिन्न इतिहास रहा है इनकी अपनी संस्कृति रही है इनकी अपनी समस्याएं रही हैं एवं अपनी महत्वाकांक्षा अभी रही हैं ऐसी स्थिति में उधार क्षेत्रवाद भारत में एक सामान्य प्रक्रिया रही है। इससे भिन्न उग्र क्षेत्रवाद भारत में एक आधुनिक प्रक्रिया रही है।