क्षेत्रवाद या क्षेत्रीयता-2

आजादी के उपरांत देश में असमान विकास की प्रक्रिया देखी गई कुछ क्षेत्रों का विकास अन्य क्षेत्रों की कीमत पर हुआ। कुछ क्षेत्रों का विकास तीव्र गति से हुआ जबकि कुछ पिछड़ते चले गए। इसके कारण पिछड़े राज्यों में सापेक्ष वंचन का भाव उत्पन्न हुआ।

उग्रक्षेत्रवाद अपने आप को भारत में अलगाववादी आंदोलनों के रूप में अभिव्यक्त करती है। यह अपने आप को अलग राज्य की मांग के रूप में भी अभिव्यक्त करती है।नदी जल बंटवारे से संबंधित एवं सीमा से संबंधित विवाद जो कि राज्यों में उपस्थित है यहां तक कि प्रवासी मजदूरों ,विद्यार्थियों पर होने वाले अत्याचार भी उम्र क्षेत्रवाद की अभिव्यक्तियां हैं।
शक्ति अथवा सत्ता की अत्यधिक केंद्रीकरण के कारण भी चित्रों में राजनैतिक मंचन का भाव उत्पन्न होता है क्षेत्र राजनीतिक रूप से कमजोर होने की अनुभूति करने लगते हैं यह भी उग्र क्षेत्रवाद का एक आधार है।
यदि समाज के बहुसंख्यक समूह की संस्कृति अन्य सांस्कृतिक समूह पर जबरन आरोपित किया जाए तब इससे भी प्रतिक्रिया है उत्पन्न होती है यह भी संघर्ष को जन्म देती है। भारत राजनीतिक रूप से एकीकृत रहा है परंतु भावनात्मक रूप से विभाजित रहा है यह आज भी एक बहुराष्ट्रीय राज्य है क्षेत्रीय भावनाओं का वर्चस्व राष्ट्रीय भावना की तुलना में ज्यादा देखा जा सकता है।
क्षेत्रवाद की समस्या को राष्ट्रवाद की भावना के माध्यम से दूर किया जा सकता है समाज का समान विकास जो कि समावेशी हो सापेक्ष वंचन के भाव को कम कर सकता है।
सांस्कृतिक सापेक्ष बाद एक अन्य महत्वपूर्ण उपकरण है यह सभी संस्कृतियों को समान सम्मान प्रदान करने की प्रक्रिया है। सांस्कृतिक सापेक्ष बाद के अनुसार कोई भी संस्कृति श्रेष्ठ अथवा ही नहीं होती है। अतः सांस्कृतिक सहिष्णुता उपस्थित होनी चाहिए। उग्रक्षेत्रवाद को खत्म करने के लिए प्रमुख उपाय लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण भी है। जब शक्ति अथवा प्राधिकार का विवरण निम्न स्तर तक हो जिससे राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित हो तब इससे क्षेत्रवाद की भावना में स्वत: कमी उत्पन्न होगी। भारत में पंचायती राज व्यवस्था को इसी उद्देश्य से स्थापित किया गया।

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