* कुछ रोग दूषित वातावरण, परिस्थिति, रहन-सहन, खान-पान व परजीवी के संक्रमण से उत्पन्न होते हैं। जबकि कुछ रोग व्यक्ति को अपने माता पिता से जन्म से ही मिलते हैं, जिसे अनुवांशिकी रोग कहते हैं। यह रोग वंशागति होते हैं अर्थात एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होते रहते हैं।
*ध्यातव्य है कि यह रोग दोषपूर्ण जीन के करण होते हैं।
*आनुवंशिकी के नियम अन्य जनपदों की भांति मानव पर भी यथावत लागू होते हैं तथा आनुवंशिकी लक्षण पीढ़ी दर पीढ़ी जाते हैं।
*रंजकहीनता, फेनिलकीटोंयूरिया, Rh-तत्व आदि वंशागति मनुष्य में होने वाले कुछ महत्वपूर्ण जीनी व्यतिक्रम हैं।
* डाउन सिंड्रोम, टर्नर सिंड्रोम, क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम आदि मानव में गुणसूत्र की त्रुटियां प्रदर्शित करते हैं।
* मनुष्य में लैंगिक लक्षणों के जींस मुख्यता: लिंग गुणसूत्रों में होते हैं। किंतु लैंगिक लक्षणों के अतिरिक्त कुछ दैहिक लक्षणों के जींस भी गुणसूत्रों में उपस्थित हो सकते हैं, जिसे लिंग संलग्न गुण कहा जाता है तथा इसकी वंशागति को लिंग संलग्न वंशागति कहते हैं।
* अधिक रक्तस्राव या हिमोफीलिया एक आनुवंशिकी लिंग सलंग्न रोग है। * इसमें रोगों में चोट पर काफी समय तक रुधिर में कुछ प्रोटींस की कमी के कारण थक्का नहीं जानता है, और उधर बराबर बहता रहता है जिससे रक्त का स्कंदन नहीं होता। यह लोग प्रायः पुरुषों में ही पाया जाता है जबकि स्त्रियां इस रोग की वाहक होती हैं