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Santosh Verma
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अफवाह के कारण माबलीचिंग (भीड़ द्वारा हिंसा )
हाल के दिनों में जिस तरह किसी अफवाह के कारण भीड़ में तब्दील हो गए लोगों की हिंसा के मामले लगातार सामने आ रहे हैं, वह बेहद चिंताजनक है। इसकी वजह से कई लोगों की जान जा चुकी है। हैरानी की बात यह है कि ऐसा करते हुए लोगों के भीतर शायद एक बार भी यह खयाल नहीं आता कि उन्होंने पुलिस को सूचना देने के बजाय खुद ही कथित संदिग्ध को मार डाला तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है
सर्वोच्च न्यायालय ने भीड़ की हिंसा पर सख्त टिप्पणी की है। इसे रोकने के लिए कानून बनाने से लेकर अन्य व्यवस्थाओं संबंधी विस्तृत आदेश दिया है। पर विडम्बना देखिये कि इसके कुछ ही घंटे बाद झारखंड के पाकुर में प्रख्यात समाजसेवी स्वामी अग्निवेश कथित रूप से भाजपा के युवा मोर्चा की हिंसा के शिकार हो गए। इसकी जितनी निंदा की जाए कम होगी।
हर विवेकशील व्यक्ति का भीड़ द्वारा की जा रही हर हत्या या हिंसा पर उद्वेलित हो उठना लाजिमी है। ऐसे में अदालत ने केंद्र सरकार को भीड़ की हिंसा को परिभाषित करके इसकी सजा निर्धारित करने वाला एक विशिष्ट कानून बनाने का निर्देश दिया है। अभी तक जितने मामले हुए, उनको पहले से व्याप्त कानून के तहत निपटाया जा रहा है।
यदि अलग से इसके लिए कानूून बन जाए तो फिर पुलिस-प्रशासन के लिए कार्रवाई ज्यादा आसान हो जाएगी। किंतु संसद में कानून तभी बन सकता है, जब विपक्ष साथ दे। देखना है केंद्र सरकार क्या करती है? चूंकि कानून-व्यवस्था राज्यों का विषय है, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने ज्यादा व्यवस्थाएं राज्यों के लिए दी है।
नागरिक अपने आप में कानून नहीं बन सकता है; लोकतंत्र में भीड़तंत्र की इजाजत नहीं दी जा सकती है। अदालत ने सरकार से भीड़ के हाथों हत्या को एक अलग अपराध की श्रेणी में रखने और इसकी रोकथाम के लिए नया कानून बनाने को कहा।
पिछले कुछ समय के दौरान कर्नाटक, त्रिपुरा, असम आदि कई राज्यों में गोहत्या से लेकर बच्चा चोरी की अफवाहों की वजह से लोगों के मारे जाने की कई घटनाएं हो चुकी हैं।
आज ज्यादातर हाथों में स्मार्टफोन मौजूद है, लेकिन इसके इस्तेमाल को लेकर जागरूकता का घोर अभाव है। ऐसी स्थिति में वाट्सऐप पर आए संदेश के सही या गलत होने की पुष्टि करना लोग जरूरी नहीं मानते और इसके असर में आकर एक उन्माद का शिकार हो जाते हैं।
सवाल है कि जिन संदेशों की वजह से लोग भीड़ में तब्दील होकर हिंसा कर रहे हैं, वे कहां तैयार किए जाते हैं और कहां से जारी किए जाते हैं। जब तक इस स्रोत को निशाने पर नहीं लिया जाएगा, तब तक किसी भी सख्त कानून की जद में वही लोग आएंगे, जिनका सिर्फ इस्तेमाल होता है। असली अपराधी परदे के पीछे सुरक्षित काम करते रहेंगे।
न्यायालय के इस आदेश के पहले से कई राज्य अफवाहों को लेकर मीडिया में विज्ञापन जारी कर लोगों को आगाह कर रहे हैं। केंद्र ने भी राज्यों के लिए एडवायजरी जारी की है और व्हाट्सएप से अफवाहों को रोकने के लिए कदम उठाने को कहा है। इतना होने के बावजूद भीड़ की हिंसा जारी है। इसका सीधा मतलब है कि अभी इस दिशा में काफी कुछ किया जाना है।
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