मुद्दा:- सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 377 को अपराधमुक्त घोषित किया
स्रोत:- भारत सरकार का राज्य सभा टीवी, डीडी न्यूज़ एवं अन्य समाचार पत्र( द हिन्दू, टाइम्स ऑफ इंडिया इत्यादि )
धारा 377-
आपराधिक जनजाति अधिनियम, 1871 (Criminal Tribes Act, 1871)
- इस अधिनियम ने कई हाशिये वाले आबादी समूहों जैसे-ट्रांसजेंडर को "सहज रूप से आपराधी" के रूप में प्रचारित किया था।
- 1949 में आपराधिक जनजाति अधिनियम को रद्द कर दिया गया था लेकिन धारा 377 अभी भी जारी थी|
- धारा 377 के खिलाफ लड़ाई में LGBT समुदाय के अनेक लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था|
- वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने बहस के दौरान तर्क दिया कि "हम केवल यौन अल्पसंख्यकों के रूप में सुरक्षा की मांग नहीं कर रहे हैं बल्कि इसमें सभी मनुष्यों का सम्मान अंतर्निहित है|
- वरिष्ठ वकील अरविंद डाटर ने तर्क दिया कि कामुकता, यौन स्वायत्तता और यौन साथी चुनने की स्वतंत्रता का अधिकार मानव गरिमा की आधारशिला है। धारा 377 लोगों के एक वर्ग को अपराधी बनाती है| यह कहना गलत है कि यह केवल कार्य को दंडित करता है न कि लोगों को।
- मेनका गुरुस्वामी ने तर्क दिया कि धारा 377 संविधान के अनुच्छेद 15 (लैंगिक भेदभाव), 14 (समानता), 19 (स्वतंत्रता) और 21 (जीवन और गरिमा) का उल्लंघन करती है। सुश्री गुरुस्वामी ने इसे एक भयानक औपनिवेशिक विरासत के रूप में चित्रित किया जिसमें "चिलिंग इफ़ेक्ट" है।
- धारा 377 के खिलाफ आवाज़ बुलंद करते हुए वरिष्ठ वकील श्याम दिवान ने अदालत से आग्रह किया कि वह 'अंतरंगता का अधिकार' घोषित करे। उन्होंने कहा कि एलजीबीटी के लोगों को उस स्थिति में मुश्किल का सामना करना पड़ता है जब वे किसी प्रियजन को इमरजेंसी में अस्पताल ले जाते हैं या बैंक खाता खोलने हेतु जाते हैं।
यह धारा-377 खंड का चौथा भाग हैं इसी क्रम मे अन्य भाग लगातार आगे .............