राष्ट्रीय बाल अधिकार सुरक्षा आयोग का नया अध्यक्ष

राष्ट्रीय बाल अधिकार सुरक्षा आयोग का नया अध्यक्ष

स्रोत:- भारत सरकार की प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो और राज्य सभा टीवी, डीडी न्यूज़ संबन्धित संस्था की मुख्य वेबसाइट एवं अन्य निजी समाचार पत्र ( द हिन्दू, टाइम्स ऑफ इंडिया,मिंट, दैनिक जागरण, जनसत्ता इत्यादि )

  • प्रियंक कानूनगो को राष्ट्रीय बाल अधिकार सुरक्षा आयोग का नया अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
  • उन्हें 3 वर्ष के कार्यकाल के लिए नियुक्त किया गया है। यह पद 16 सितम्बर, 2018 को स्तुति कक्कड़ के कार्यकाल के ख़त्म होने के बाद से खाली था।
  • केंद्रीय महिला और बाल विकास विभाग की तरफ से एनसीपीसीआर के अध्यक्ष के रूप में कानूनगो का मनोनयन किया गया है. ये वर्तमान में एनसीपीसीआर के सदस्य (शिक्षा) के रूप में कार्य कर रहे थे |
  • 31 अक्टूबर 2018 को इनका कार्यकाल समाप्त हो रहा था. वे अब अक्टूबर 2021 तक एनसीपीसीआर के अध्यक्ष रहेंगे |
  • केंद्र सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून 2009 को सख्ती से देश भर में लागू करने के उद्देश्य से इन्हें नयी जिम्मेवारी सौंपी है |
  • राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एन- सी- पी- सी- आर-) की स्थापना संसद के एक अधिनियम (दिसम्बर 2005) बालक अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के अंतर्गत मार्च 2007 में की गई थी।
  • आयोग का अधिदेश यह सुनिश्चित करना है कि समस्त विधियाँ, नीतियां कार्यक्रम तथा प्रशासनिक तंत्र बाल अधिकारों के संदर्श के अनुरूप हों, जैसाकि भारत के संविधान तथा साथ ही संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन (कन्वेशन) में प्रतिपाादित किया गया है।
  • बालक को 0 से 18 वर्ष के आयु वर्ग में शामिल व्यक्ति के रूप में पारिभाषित किया गया है।
  • आयोग अधिकारों पर आधारित संदर्श की परिकल्पना करता है, जो राष्ट्रीय नीतियों और कार्यक्रमों में प्रवाहित होता है, जिसके साथ राज्य, जिला और खण्ड स्तरों पर पारिभाषित प्रतिक्रियाएं भी शामिल है, जिसमें प्रत्येक क्षेत्र की विशिष्टताओं और मजबूतियों को भी ध्यान में रखा जाता है |
  • प्रत्येक बालक तक पहुंच बनाने के उद्देश्य से, इसमें समुदायों तथा कुटुम्बों तक गहरी पैठ बनाने का आशय रखा गया है तथा अपेक्षा की गई है कि क्षेत्र में हासिल किए गए सामूहिक अनुभव पर उच्चतर स्तर पर सभी प्राधिकारियों द्वारा विचार किया जाएगा।
  • इस प्रकार, आयोग बालकों तथा उनकी कुशलता को सुनिश्चित करने के लिए राज्य के लिए एक अपरिहार्य भूमिका, सुदृढ़ संस्था-निर्माण प्रक्रियाओं, स्थानीय निकायों और समुदाय स्तर पर विकेन्द्रीकरण के लिए सम्मान तथा इस दिशा में वृहद सामाजिक चिंता की परिकल्पना करता है।
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