उपभोक्ता संरक्षण बिल-2018

उपभोक्ता संरक्षण बिल-2018

चर्चा का कारण-

  • उपभोक्ताओं के हित के संरक्षण तथा उनसे जुड़े विवादों का समय से प्रभावी निपटारा के लिए लोकसभा में 20 दिसंबर 2018 को उपभोक्ता संरक्षण विधेयक 2018 (Consumer Protection Bill) पास किया गया है ।

मुख्य बिन्दु-

  • उपभोक्ता संरक्षण विधेयक 2018 पुराने उपभोक्ता संरक्षण कानून 1986 की जगह लेगा ।
  • पारित किये गए विधेयक में उपभोक्ता (Consumer) शब्द को परिभाषित किया गया है।
  • विधेयक के अनुसार, उपभोक्ता वह व्यक्ति है जो अपने इस्तेमाल के लिये कोई वस्तु खरीदता है या सेवा प्राप्त करता है। इसमें वह व्यक्ति शामिल नहीं है जो दोबारा बेचने के लिये किसी वस्तु को हासिल करता है या व्यावसायिक उद्देश्य के लिये किसी वस्तु या सेवा को प्राप्त करता है।

उद्देश्य-

  • इसका उद्देश्य भ्रामक विज्ञापनों, डिजिटल लेनदेन और ई-कॉमर्स से जुड़ी समस्याओं को बेहतर तरीके से दूर करके उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना है

विधेयक से संबंधित मुख्य तथ्य:

  • यह बिल उपभोक्ता अधिकारों को अहमियत प्रदान करता है इसके साथ ही यह बिल खराब वस्तुओं एवं सेवाओं में दोष से संबंधित शिकायतों के निवारण के लिए व्यवस्था प्रदान करता है ।
  • पहले उपभोक्ता को वहां जाकर शिकायत करनी होती थी जहां से उसने सामान खरीदा है, लेकिन अब घर से ही शिकायत की जा सकती है। इसके अलावा विधेयक में मध्यस्थता का भी प्रावधान है ।
  • नए विधेयक में प्रावधान है कि अगर जिला और राज्य उपभोक्ता फोरम उपभोक्ता के हित में फैसला सुनाते हैं तो आरोपी कंपनी राष्ट्रीय फोरम में नहीं जा सकती ।
  • स्थाई समिति ने भ्रामक विज्ञापनों में दिखने वाले सेलिब्रिटियों को जेल की सजा की सिफारिश की थी लेकिन इसमें केवल जुर्माने का प्रावधान किया गया है ।

उपभोक्ताओं के अधिकार

  • विधेयक में उपभोक्ताओं के अधिकारों की बात की गई है, जो इस प्रकार हैं-
  1. ऐसी वस्तुओं और सेवाओं की मार्केटिंग के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करना, जो जीवन और संपत्ति के लिये जोखिमपरक है।
  2. वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता, मात्रा, शक्ति, शुद्धता, मानक और मूल्य की जानकारी प्राप्त होना।
  3. प्रतिस्पर्द्धात्मक मूल्यों पर वस्तु और सेवा उपलब्ध होने का आश्वासन प्राप्त होना
  4. अनुचित या प्रतिबंध व्यापार की स्थिति में मुआवज़े की मांग करना।

तीन स्तरीय नियामक की व्यवस्था-

  • उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम को लागू कराने के लिए तीन स्तरीय नियामक की व्यवस्था की गयी है।
  • सबसे ऊपर राष्ट्रीय आयोग, उसके नीचे राज्य आयोग और सबसे नीचे स्तर पर जिला आयोग होंगे।
  • केंद्रीय आयोग का आदेश नहीं मानने पर छह महीने तक की कैद या 20 लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं ।
  • जिला आयोग के आदेश के खिलाफ राज्य आयोग में और राज्य आयोग के आदेश के खिलाफ राष्ट्रीय आयोग में अपील की जा सकती है।
  • राष्ट्रीय आयोग के आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील की जा सकेगी।
  • असामान्य परिस्थितियों को छोड़कर अपील आदेश के 30 दिन के भीतर करनी होगी ।

स्रोत:- भारत सरकार की प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो और राज्य सभा टीवी, डीडी न्यूज़ संबन्धित संस्था की मुख्य वेबसाइट एवं अन्य निजी समाचार पत्र ( द हिन्दू, टाइम्स ऑफ इंडिया,मिंट, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, जनसत्ता इत्यादि ) |

नोट:- इस जानकारी का उपयोग केवल शिक्षण कार्य एवं जानकारी के लिए किया जा रहा हैं |

Posted on by