भारत में हिंदू धर्म भाग 4

भारत में हिंदू धर्म भाग 4

धार्मिक यज्ञ तथा बलिया मुक्ताकाश में की जाती थी किंतु बाद में पूजा या देवी प्रतिमाओं की आराधना आरंभ हो गई सीख रही है मंदिरों के निर्माण की आवश्यकता होने लगी तथा बहुत से विचारों के मिश्रण के फल स्वरुप हिंदुत्व पवित्र ग्रंथों पूजा क्षेत्रों तथा ईश्वर की तादाद में स्थापित करने वाले पुजारियों के साथ एक वास्तविक धर्म बन गया ।

हिंदू परंपराओं के अनुसार काम आमोद प्रमोद कभी-कभी योन संबंधी तथा अर्थ की प्राप्ति के लिए प्रयत्न किया जाना चाहिए किंतु झेप प्राप्त करने के पश्चात व्यक्ति को धर्म साधना को अपना लक्ष्य बनाना चाहिए ।

उपनिषद में स्पष्ट रूप से जीवन की चार अवस्थाएं बताई गई है जो निम्नलिखित हैं-

  1. ब्रह्मचर्य( अविवाहित विद्यार्थी) - ऐसे विद्यार्थी जो बाद में शादी करके गृहस्थ जीवन बिताते हैं परंतु इस समय वह अपनी शिक्षा दीक्षा का कार्य संपन्न करते हैं ।
  2. गृहस्थ ( गृहस्वामी ) - यह ऐसा समय होता है जिसमें व्यक्ति ब्रह्मचर्य स्थिति से निकल कर शादी करके अपने समस्त पारिवारिक दायित्वों को पूरा करता है एवं संतान उत्पत्ति जैसे सामाजिक परंपरा की पूर्ति करता है ।
  3. वानप्रस्थ (एकांतवास)- इस समय व्यक्ति अपनी गृहस्थी जीवन को त्याग कर एकांतवास को ग्रहण कर लेता है एवं जीवन की अंतिम अवस्था सन्यासी तक इसी में रहते हैं ।
  4. सन्यासी (तपस्वी) - यह जीवन की अंतिम अवस्था होती है जिसमें व्यक्ति अपने सभी दायित्वों को त्याग कर पूरी तरह से तपस्वी बन जाता है एक बार सन्यासी बन जाने के पश्चात व्यक्ति मुक्ति या निर्वाण की प्राप्ति की चेष्टा मेरा तक हो जाता है ।

स्रोत- विभिन्न पाठ्यपुस्तक

आगे क्रमशः जारी भाग 5 में...............

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